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मरुआ, मरजोर्म, वन तुलसी, मुरवा, मर्जन, मरदाकुश के पौधे के फायदे व बीज

आप घर के आगे क्यारी या गमले पॉट आदि में मरुआ का पौधा लगाये अनेको फायदे

by Editor
February 25, 2024
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Marua Seeds / Marjoram / Murru / Marjan / Maruvamu / Origanum majorana Seeds AA Enterprises

Marua Seeds / Marjoram / Murru / Marjan / Maruvamu / Origanum majorana Seeds AA Enterprises

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मरुआ के कई नाम है .. संस्कृत में – मरू , मरुबक , मरुत , शीतलक
हिंदी – मरुआ
पंजाबी – मरुआ
उत्तराखंड – वन-तुलसी
तमिल – मारु
बंगाली – मुर्रू
मराठी – मुरवा
मलयालम – मरुवामु
तेलगु – मरुवमु
अंग्रेजी में-मरजोरम ( marjoram )
फारसी में – मरजन
अरबी में – मरदाकुश
यह एक ऐसा पौधा है जो काफी सुगंधित होने के साथ-साथ काफी सुंदर भी होता है। इस में लगने वाले फूलों का रंग सफेद और बैंगनी होता है। पौधा देखने में आमतौर पर तुलसी के पौधे के जैसा ही लगता है। इसका वानस्पतिक नाम ऑरिगेनम मेरोजाना है। इस पौधे की खासियत यह है कि इसको किसी भी जगह पर बहुत आसानी के साथ उगाया जा सकता है। बहुत से लोग इसे अपने घरों, बागों और मंदिर में लगाते हैं जिससे कि वहां का वातावरण ख़ुशबू से भरा रहे।
पौधे का नाम मरूआ
वानस्पतिक नाम ऑरिगेनम मेरोजाना
अन्य नाम मरू, मरूबक, वन तुलसी, मारू, मुरवा, मरजोरम, मरदाकुश, मरजन
मूल स्थान यूरोप, अफ्रीका
कहां उगाया जाता है भारत , अमेरिका अफ्रीका, यूरोप
फूलों का रंग सफेद और बैंगनी
पत्तियों का रंग हरा
स्वाद तीखा
स्वभाव गर्म
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मरूआ पौधे के फायदे (marua plant benefits in hindi)

मरूआ पौधे को अनेकों प्रकार की घरेलू दवाइयों को बनाने के लिए बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है। इसके अंदर बहुत सारे औषधीय और आयुर्वेदिक गुण पाए जाते हैं जिसकी वजह से आपको इससे निम्नलिखित फायदे मिल सकते हैं जो कि इस प्रकार से हैं –

मरूआ पौधे के फायदे सूजन में

मरूआ पौधे की टहनियां व्यक्ति के शरीर की सूजन को कम करने में लाभदायक साबित हो सकती हैं। यहां बता दें कि इसकी टहनियों को पानी में अच्छी तरह से उबालने के बाद सूजन वाली जगह पर इस गर्म पानी से मालिश करने पर लाभ मिलता है। साथ ही बता दें कि सूजन कम करने के अलावा यह शरीर के दर्द में राहत पहुंचाने का काम भी करता है।
मरूआ पौधे के लाभ पेचिश में

पेचिश एक ऐसी भयानक स्थिति है जिसकी वजह से व्यक्ति की हालत काफी ज्यादा खराब हो जाती है और अगर ठीक से इलाज न करवाया जाए तो जान जाने का खतरा भी रहता है। यहां बता दें कि जिन लोगों को पेचिश की समस्या हो गई है उन्हें चाहिए कि मरूआ के पौधे की पत्तियों को लेकर उनको अपने हाथ में मसल कर अपने पेट पर उसे मालिश कर लें। फिर उसके बाद उस जगह की हल्की-हल्की सिकाई कर लें। ऐसा करने से पेचिश में तुरंत राहत मिलेगी।

सिर-दर्द में मरूआ पौधे के फायदे

आमतौर पर कुछ लोगों को सिर में दर्द की शिकायत बनी रहती है। तो ऐसे में उन्हें चाहिए कि वे मरूआ पौधे का सेवन करके सिर दर्द से छुटकारा हासिल करें। यहां बता दें कि इस के ताजा पौधों से आप शीतनिर्यास मज्जा तैयार करें और हेडेक से छुटकारा पाएं।
अगर आप अपने भोजन को थोड़ा तीखा और सुगंध से भरपूर बनाना चाहते हैं तो उसमें मरुआ पौधे की पत्तियों का इस्तेमाल जरूर करें. अगर आप इस पौधे के गुणों को जानते हैं तो इसकी जानकारी लोगों को बताने से परहेज नहीं करेंगे. कारण यह है कि मरुआ उम्र बढ़ने के लक्षणों को स्लो कर देता है. तीखी गंध से भरपूर मरुआ संक्रमण को भी रोकता है. विदेशी पौधा है मरुआ, लेकिन भारत में भी हजारों वर्षों से उग रहा है।
पूरे भारत के लोग मरुआ (Sweet Marjoram) से परिचित होंगे. यह पार्क, किचन गार्डन में तो नजर आएगा ही, जहां पर हरियाली होगी, वहां यह उगता हुआ दिखाई दे जाएगा. यह मिंट परिवार का है लेकिन इसके पत्ते तुलसी जैसे दिखते हैं. इसके पत्तों की विशेषता यह है कि उसके दोनों और बारीक रोम होते हैं. यह पौधा इसलिए सर्वविदित है क्योंकि इसके पत्तों में तीखी अजवायन जैसी गंध आती है. विशेष बात यह है कि दक्षिण भारत में लोग इस पौधे को खूब पसंद करते हैं और अपने आहार में इसे शामिल करते हैं.
मरुआ बनतुलसी या बबरी की जाति का एक पौधा।

यह पौधा बागों में लगाया जाता है। इसकी पत्तियाँ बबरी की पत्तियाँ से कुछ बड़ी, नुकीली, मोटी, नरम और चिकनी होती हैं, जिनमें से उग्र गंध आती है। इसके दर देवताओं पर चढ़ाए जाते हैँ। इसका पेड़ ड़ेढ दो हाथ ऊँचा होता है और इसकी फुनगी पर कार्तिक अगहन में तुलसी के भाँति मंजरी निकलती है जिसमें नन्हें-नन्हें सफेद फूल लगते हैं। फूलों के झड़ जाने पर बीजों से भरे हुए छोटे-छोटे बीजकोश निकल आते हैं, जिनमें से पकने पर बहुत सारे बीज निकलते हैं। ये बीज पानी में पड़ने पर ईसबगोल की तरह फूल जाते हैं।

यह पौधा बीजों से उगता है, पर यदि इसकी कोमल टहनी या फुनगी लगाई जाये तो वह भी लग जाती है। रंग के भेद से मरुआ दो प्रकार का होता है, काला और सफेद। काले मरुए का प्रयोग औषधि रूप में नहीं होता और केवल फूल आदि के साथ देवताओं पर चढ़ाने के काम आता है। सफेद मरुआ ओषधियों में काम आता है। वैद्यक में यह चरपरा, कड़ुआ, रूखा और रुचिकर तथा तीखा, गरम, हलका, पित्तवर्धक, कफ और वात का नाशक, विष, कृमि और कृष्ठ रोग नाशक माना गया है।
पर्यायवाची — मरुवक, मरुत्तक, फणिज्जक, प्रस्थपुष्प, समीरण, कुलसौरभ, गधंपत्र, खटपत्र।
मरुआ बनतुलसी या बबरी की जाति का एक पौधा।
यह पौधा बागों में लगाया जाता है। इसकी पत्तियाँ बबरी की पत्तियाँ से कुछ बड़ी, नुकीली, मोटी, नरम और चिकनी होती हैं, जिनमें से उग्र गंध आती है। इसके दर देवताओं पर चढ़ाए जाते हैँ। इसका पेड़ ड़ेढ दो हाथ ऊँचा होता है और इसकी फुनगी पर कार्तिक अगहन में तुलसी के भाँति मंजरी निकलती है जिसमें नन्हें-नन्हें सफेद फूल लगते हैं। फूलों के झड़ जाने पर बीजों से भरे हुए छोटे-छोटे बीजकोश निकल आते हैं, जिनमें से पकने पर बहुत सारे बीज निकलते हैं। ये बीज पानी में पड़ने पर ईसबगोल की तरह फूल जाते हैं।
यह पौधा बीजों से उगता है, पर यदि इसकी कोमल टहनी या फुनगी लगाई जाये तो वह भी लग जाती है। रंग के भेद से मरुआ दो प्रकार का होता है, काला और सफेद। काले मरुए का प्रयोग औषधि रूप में नहीं होता और केवल फूल आदि के साथ देवताओं पर चढ़ाने के काम आता है। सफेद मरुआ ओषधियों में काम आता है। वैद्यक में यह चरपरा, कड़ुआ, रूखा और रुचिकर तथा तीखा, गरम, हलका, पित्तवर्धक, कफ और वात का नाशक, विष, कृमि और कृष्ठ रोग नाशक माना गया है।
पर्यायवाची — मरुवक, मरुत्तक, फणिज्जक, प्रस्थपुष्प, समीरण, कुलसौरभ, गधंपत्र, खटपत्र।
Maruwak: मरूवक के हैं बहुत अनोखे फायदे- Acharya Balkrishan Ji (Patanjali)
वानस्पतिक नाम : Origanum majorana Linn. (ओरिगेनम मेजोराना) Syn-Majorana hortensis Moench; Majorana fragrans Raf.
कुल : Lamiaceae (लैमिएसी)
अंग्रेज़ी नाम : Sweet marjoram
(स्वीट मरजोरम)
संस्कृत-मरुबक, समीरण, प्रस्थपुष्प, मरु, फणी, फणिज्जक, मरूतक, मरुत्, खरपत्र, गन्धपत्र, बहुवीर्य, शीतलक, सुराह्व, प्रस्थकुसुम, आजन्मसुरभिपत्र, कुलसौरभ; हिन्दी-अरुआ, मरुवा; उत्तराखण्ड-बन तुलसी (bantulsi); उर्दू-मरवाकुष्ठा (Marvakhustha), मरवा (Marwa); कन्नड़-मरुगा (Maruga); गुजराती-मरवो (Marvo); तमिल-मारू (Marru); तैलुगु-मरुवमु (Maruvamu); बंगाली-मुर्रु (Murru); नेपाली-मरुवा फूल (Marua phul); मराठी-मूरवा (Murwa); मलयालम-मारुवामू (Maruvamu)।
अंग्रेजी-मरजोरम (Marjoram), नौटेड मरजोरम (Knotted marjoram); अरबी-मरदाकुश (Mardaqush), मीजुनजुष (Mizunjush); फारसी-मरजन (Marjan), जोस (Jos)।
परिचय
यह पौधा समस्त भारत में विशेषकर कर्नाटक, आंध्रप्रदेश तथा तमिल घरों की वाटिका में सुगन्धित पत्रों के कारण उगाया जाता है। तुलसी की तरह दिखने वाला यह पौधा अत्यन्त सुगन्धित होता है। इसका पत्र-स्वरस कृमिनाशक होता है। इसके पुष्प बैंगनी अथवा कदाचित् श्वेत वर्ण के तथा फल चिकने होते हैं। यह मूलत यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका का निवासी है। उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में भी इसकी खेती की जाती है।
आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव
मरूवा हल्का, रूक्ष, तीक्ष्ण, तिक्ता, चरपरा, उष्ण, कफवात-शामक, कुष्ठघ्न, कृमिघ्न, विषघ्न, वेदनास्थापन, दुर्गन्धनाशक, रुचिकारक, दीपन, आर्तवजनन, हृदय-उत्तेजक, ज्वरघ्न, कटु, पौष्टिक तथा पित्तवर्धक है।
इसका पौधा सूक्ष्मजीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, कृमिघ्न, क्षुधावर्धक, रक्तशोधक, हृद्य, मूत्रल तथा कफवातशामक होता है।
यह ऐंठन, अवसाद, उदरात्र विकार, अर्धावभेदक, शिरशूल, पक्षाघात, कास तथा श्वास शामक होता है।
औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि
शिर शूल-मरुवक के ताजे पौधे को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है।
पोथकी-मरुबक और लहसुन के स्वरस को मिलाकर 1-2 बूँद नेत्र में डालने से पोथकी में लाभ होता है।
नेत्ररोग-मरुबक पत्रस्वरस से पलाश बीज चूर्ण को भावित कर अंजन करने से नेत्रशुक्र (फूली) में लाभ होता है।
कर्णपूय-मरुवक पत्र-स्वरस (2-3 बूँद) को कान में डालने से कर्णपूय का शमन होता है।
कास-5 मिली मरुआ पत्र-स्वरस में समभाग मधु मिलाकर सेवन करने से कास में लाभ होता है।
5-10 मिली मरुआ मूल-स्वरस का सुबह-शाम सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है व उदरगत कृमियों का शमन होता है।
उदरशूल-4 ग्राम मरुवक पत्र तथा बीज चूर्ण को सुबह-शाम उष्णोदक के साथ देने से उदरशूल में लाभ होता है।
प्रवाहिका-मरुवक तैल को पेट पर मलकर स्वेदन करने से तीव्र प्रवाहिका में लाभ होता है।
विबन्ध-मरुवक का 20-40 मिली फाण्ट बनाकर देने से विरेचन होकर विबन्ध का शमन होता है।
मासिक विकार-मरुआ के 20-30 मिली फाण्ट को नियमित देने से रजविकारों में लाभ होता है।
गठिया-मरुआ के पञ्चाङ्ग का क्वाथ बनाकर 20 मिली मात्रा में दिन में तीन बार पीने से गठिया रोग में लाभ होता है।
मरुआ के पञ्चाङ्ग को पीसकर लगाने से त्वकविकार व मोच में लाभ होता है।
वातव्याधि-मरुवक-स्वरस को वातव्याधि से पीड़ित अंग पर लगाने से वेदना व भल्लातक जन्य शोथ का शमन होता है।
मरुवक स्वरस का लेप करने से भल्लातक जन्य शोथ का शमन होता है।
कुष्ठ-मरुआ पत्र-स्वरस का लेप करने से कुष्ठ व दद्रु में लाभ होता है।
वेदना शोथ-मरुआ की टहनियों को पानी में उबालकर बफारा देने से वेदना युक्त शोथ और संधिवात में लाभ होता है।
वरटी विष-मरिच, सोंठ, सेंधानमक तथा सौवर्चल नमक में मरुबक पत्र-स्वरस मिलाकर लेप करने से वरटीजन्य (ततैया) विष प्रभाव का शमन होता है।
वरटी (बर्रे, ततैया) दंश में सर्वप्रथम शत्र से दंश को निकाल कर उस स्थान पर मरुवक स्वरस को लगाने से दंश जन्य वेदना आदि प्रभावों का शमन होता है।
अशुद्ध पारद सेवनजन्य-विकृति-अशुद्ध पारद अथवा उसके योग के सेवन से उत्पन्न विकृति के शमनार्थ 6-6 ग्राम पुदीना तथा मरुवक स्वरस में 50 ग्राम मिश्री तथा 20 मरिच मिलाकर, शीतल जल में घोल बनाकर पीना चाहिए
प्रयोज्याङ्ग :पञ्चाङ्ग, पत्र, बीज एवं तैल।
मात्रा :क्वाथ 10-20 मिली। स्वरस 5-10 मिली या चिकित्सक के परामर्शानुसार।
विशेष :कई विद्वान (Ocimum basilicum Linn.) को मरूआ मानते है; परन्तु यह मरूआ से भिन्न दूसरी प्रजाति है।
बारिश का सीजन जाने के बाद बीमारियों के सीजन का आगमन हो जाता है। इसका बड़ा कारण घर में आने वाले मच्छर भी होते हैं। इन दिनों में आमतौर पर घरों में मच्छर या कई तरह के कीड़े दिखाई दे ही जाते हैं। इनके काटने या खाने पीने के सामान पर बैठने से घर के लोग बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इन दिनों राजधानी भोपाल में मलेरिया और डेंगू का प्रभाव काफी ज्यादा है। हालही में स्वास्थ विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट में सिर्फ भोपाल में ही अब तक 1200 से अधिक मरीज डेंगू के पॉजिटिव सामने आ चुके हैं इनमें से एक पॉजिटिव की मृत्यु भी हो चुकी है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए हम आपको एक ऐसे पौधे के बारे में बता रहे हैं जिसका नाम भले ही सुनने में अजीब लगे, लेकिन इसकी गंध से मच्छर और जहरीले कीड़े आपके आसपास भी नहीं भटक पाएंगे।

Marua Seeds / Marjoram / Murru / Marjan / Maruvamu / Origanum majorana Seeds AA Enterprises
Marua Seeds / Marjoram / Murru / Marjan / Maruvamu / Origanum majorana Seeds AA Enterprises

In Sanskrit – Maru, Marubak, Marut, Sheetalak
In Hindi – Marua
In Punjabi – Marua
In Uttarakhand – Van-Tulsi
In Tamil – Maru
In Bengali – Murru
In Marathi – Murwa
In Malayalam – Maruvamu
In Telugu – Maruvamu
In English – Marjoram
In Persian – Marjan
In Arabic – Marda Kush
Plant Name: Marua
Botanical Name: Origanum majorana
Other Names: Maru, Marubak, Van Tulsi, Maru, Murwa, Marjoram, Mardakush, Marjan
Native Region: Europe, Africa
Grown: India, America, Africa, Europe
Flower Color: White and Purple
Leaf Color: Green
Taste: Spicy
Marua is a type of plant belonging to the basil family, also known as bush basil or Babri.

This plant is commonly cultivated in gardens. Its leaves are larger, pointed, thick, soft, and glossy compared to basil leaves, emitting a strong aroma. It is often offered to deities.

The plant grows to about one and a half to two hands high, and during the Kartik month, small white flowers resembling tulsi flowers appear on its branches. When the flowers fall off, small seed pods filled with seeds emerge, which when ripe, release many seeds. These seeds swell up like isabgol when soaked in water.

This plant grows from seeds, but if its tender stem or branch is planted, it also takes root. Marua comes in two types based on color, black and white. Black marua is not used for medicinal purposes and is only used for offering to deities along with flowers. White marua is used for medicinal purposes. Medically, it is considered bitter, pungent, rough, and tasty, as well as being a mild, hot, mild, pitta-increasing, expectorant, and anti-vata. It is also considered anti-toxic, anti-parasitic, and anti-worm.

Synonyms include Maruvak, Maruttak, Phanijjak, Prasthapushpa, Samiran, Kulasaurabh, Gadhapatra, and Khatpatra.

Tags: Marua Seeds / Marjoram / Murru / Marjan / Maruvamu / Origanum majorana Seeds AA Enterprises
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